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    सती दाक्षायणी शक्ति धाम एवं सिद्धेश्वर महादेव मंदिर, सांचौर

    SanchoreBy SanchoreJanuary 25, 2026No Comments3 Mins Read
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    सती दाक्षायणी शक्ति धाम तथा सिद्धेश्वर महादेव का मंदिर, सांचौर उपखंड मुख्यालय से लगभग 5 कि.मी. उत्तर दिशा में सिद्धेश्वर गांव में स्थित एक प्रमुख पौराणिक धार्मिक स्थल है। इस पावन स्थल का वर्णन स्कंद पुराण में अग्नि क्षेत्र के रूप में किया गया है।

    प्राचीन काल में जब सांचौर सत्यपुर (Satyapur) नाम से वैभवशाली नगर था, उस समय सती दाक्षायणी का विशाल और भव्य मंदिर नगर की उत्तरी सीमा का निर्धारण करता था।

    स्कंद पुराण में सती दाक्षायणी धाम का वर्णन

    स्कंद पुराण के अनुसार शाकल्य ऋषि की कन्या “साची” ने शाप मुक्ति हेतु आशुतोष हर (महादेव) की आराधना की। भगवान शंकर के प्रसन्न होने पर यह स्थल साची एवं हर के संयुक्त नाम से “साचीहर” कहलाया।

    राजा दक्ष की पुत्री एवं शिव की अर्धांगिनी होने के कारण यह स्थान सतीपुर नाम से भी जाना गया। सती दाक्षायणी की इच्छा से नगर के चारों ओर विशाल प्रकोटा बनाया गया तथा देवी स्वयं सती दाक्षायणी के रूप में यहाँ अधिष्ठित हुईं।

    सती दाक्षायणी शक्ति धाम एवं सिद्धेश्वर महादेव

    सती दाक्षायणी शक्ति धाम एवं सिद्धेश्वर महादेव मंदिर, सांचौर (राजस्थान)
    सती दाक्षायणी शक्ति धाम एवं सिद्धेश्वर महादेव मंदिर सांचौर

    पौराणिक साक्ष्यों के अनुसार दक्ष की पुत्री सती ने अपने पिता के यज्ञ में, अपने पति भगवान शंकर के अपमान से आहत होकर स्वयं को यज्ञ कुण्ड में समर्पित कर दिया। तंत्र चूड़ामणि के अनुसार सती के शरीर के विभिन्न अंग 52 स्थलों पर गिरे, जो शक्तिपीठ कहलाए।

    सिद्धेश्वर स्थित सती दाक्षायणी शक्ति धाम में देवी सती अपने सर्वांग रूप में विराजमान हैं। देवी के दाहिनी ओर सिद्धेश्वर महादेव प्रतिष्ठित हैं। इस प्रकार यह शक्तिपीठ शक्ति और शिव दोनों की संयुक्त उपासना का दुर्लभ स्थल है।

    मंदिर का ऐतिहासिक विनाश और पुनः प्रतिष्ठा

    महमूद गजनवी एवं अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमणों में इस प्राचीन नगर का वैभव नष्ट हुआ तथा सती दाक्षायणी का मंदिर भी ध्वस्त कर दिया गया। यहाँ आज भी खंडित प्रतिमाएँ और पुरातात्विक साक्ष्य मिलते हैं।

    कहा जाता है कि आक्रमणकारियों से बचाने हेतु सती दाक्षायणी एवं शिवलिंग को भूमिगत किया गया तथा साचीहर विप्रवरों ने अपने प्राणों की आहुति दी।

    कालांतर में विक्रम संवत 1763, चैत्र वदी 5, रविवार को व्यास चतुर्भुजजी कात्यायन ने अंतःप्रेरणा से इस प्रतिमा को सिद्धेश्वर टीले से बाहर निकालकर पुनः प्रतिष्ठित किया। विक्रम संवत 1802 में जनसहयोग से मंदिर निर्माण हुआ।

    सांचौर के अन्य पौराणिक धार्मिक स्थल

    सांचौर क्षेत्र में पातालेश्वर महादेव मंदिर, सेवड़ा तथा
    गोलासन हनुमान जी मंदिर, गोलासन भी श्रद्धालुओं के बीच प्रसिद्ध हैं।

    सती दाक्षायणी शक्ति धाम कैसे पहुँचे

    वर्तमान में सिद्धेश्वर मंदिर तक पहुँचने के लिए सांचौर की दूरी और परिवहन मार्गदर्शिका का अनुसरण किया जा सकता है। वर्ष 1981 में स्व. पंडित राम नारायण न्यास के गठन से यहाँ संगमरमर का भव्य मंदिर, यज्ञशाला, धर्मशाला एवं भोजनशाला का निर्माण हुआ।

    इस शक्तिपीठ में शारदीय एवं चैत्र नवरात्र की साधना का विशेष धार्मिक महत्व है।

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